त्रिफला आयुर्वेद की सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं व्यापक रूप से प्रयुक्त औषधीय कल्पनाओं (Herbal Formulations) में से एक है। भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में इसका प्रयोग तीन हजार वर्षों से भी अधिक समय से निरंतर किया जाता रहा है। यह विशेष रूप से पाचन तंत्र को सुदृढ़ बनाने, शरीर के सौम्य शोधन (डिटॉक्सिफिकेशन), पुनर्यौवन (रसायन), रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि तथा समग्र स्वास्थ्य संवर्धन के लिए प्रसिद्ध है। इसकी विशेषता इसकी सरल संरचना, संतुलित गुणों तथा स्वास्थ्य के प्रति समग्र (Holistic) दृष्टिकोण में निहित है।
'त्रिफला' शब्द दो संस्कृत शब्दों—'त्रि' अर्थात् तीन तथा 'फल' अर्थात् फल—से मिलकर बना है। इस प्रकार त्रिफला का शाब्दिक अर्थ है "तीन फलों का योग"। यह शास्त्रीय आयुर्वेदिक कल्पना तीन औषधीय वृक्षों के सूखे फलों से निर्मित होती है—
- हरितकी (Terminalia chebula)
- विभीतकी (Terminalia bellirica)
- आमलकी अथवा आँवला (Phyllanthus emblica)
आयुर्वेद के अनुसार ये तीनों फल मिलकर शरीर के तीन मूलभूत दोषों - वात, पित्त एवं कफ का संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। यही त्रिदोष शरीर एवं मन की समस्त शारीरिक तथा मानसिक क्रियाओं का संचालन करते हैं। जब ये संतुलित रहते हैं, तब स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है; जबकि असंतुलन अनेक रोगों का कारण बन सकता है।
त्रिफला के प्रमुख स्वास्थ्य लाभ
त्रिफला का उपयोग परम्परागत रूप से अनेक स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी इसके अनेक गुणों के प्रति निरंतर रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं—
1. पाचन तंत्र के स्वास्थ्य में सहायक
त्रिफला का सबसे प्रसिद्ध उपयोग पाचन शक्ति को सुदृढ़ बनाने में माना जाता है। यह भोजन के समुचित पाचन में सहायता करती है, पोषक तत्त्वों के अवशोषण (Nutrient Absorption) को बेहतर बनाती है तथा मलोत्सर्जन को नियमित बनाए रखने में सहायक होती है।
तीव्र रेचक (Strong Laxatives) औषधियों के विपरीत, त्रिफला का प्रभाव सौम्य एवं प्राकृतिक होता है। यह मल त्याग की प्रक्रिया को सहज बनाती है तथा सामान्यतः निर्भरता (Dependency) उत्पन्न नहीं करती। इसी कारण उपयुक्त मात्रा में इसका दीर्घकालिक उपयोग भी आयुर्वेद में स्वीकार्य माना गया है।
2. शक्तिशाली प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidant) गुण
त्रिफला में पॉलीफेनॉल (Polyphenols), फ्लेवोनॉयड्स (Flavonoids) तथा टैनिन्स (Tannins) जैसे अनेक प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारक यौगिक पाए जाते हैं। ये मुक्त मूलकों (Free Radicals) को निष्क्रिय करने तथा ऑक्सीडेटिव तनाव (Oxidative Stress) को कम करने में सहायक होते हैं।
ऑक्सीडेटिव तनाव कोशिकाओं की समयपूर्व क्षति तथा अनेक दीर्घकालिक रोगों का एक प्रमुख कारण माना जाता है। प्रतिऑक्सीकारक गुणों के कारण त्रिफला कोशिकीय स्वास्थ्य की रक्षा करने तथा स्वस्थ एवं संतुलित वृद्धावस्था (Healthy Ageing) को प्रोत्साहित करने में सहायक मानी जाती है।
3. आंत्र स्वास्थ्य (Gut Health) का संवर्धन
आधुनिक शोध से संकेत मिलता है कि त्रिफला आंतों में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीवों (Beneficial Gut Microbiota) की वृद्धि को प्रोत्साहित कर सकती है। इससे आंत्र जीवाणुओं का संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।
स्वस्थ आंत्र माइक्रोबायोम केवल पाचन क्रिया के लिए ही नहीं, बल्कि पोषक तत्त्वों के अवशोषण, रोग-प्रतिरोधक क्षमता तथा समग्र स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
4. रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को सुदृढ़ बनाना
विशेष रूप से आमलकी में विद्यमान प्राकृतिक विटामिन C एवं अन्य प्रतिऑक्सीकारक तत्व शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को समर्थ बनाने में सहायक माने जाते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला का नियमित एवं संतुलित सेवन शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है तथा सामान्य संक्रमणों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि करता है।
5. शरीर का सौम्य शोधन (Gentle Detoxification)
आयुर्वेद में त्रिफला को एक प्रभावी किन्तु सौम्य शोधनकारी योग माना गया है। यह शरीर में संचित अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन में सहायता करती है तथा शरीर की स्वाभाविक शुद्धि प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है।
इसकी विशेषता यह है कि यह शरीर की ऊर्जा एवं बल को क्षीण किए बिना विषाक्त पदार्थों के निष्कासन में सहायक होती है। यही कारण है कि इसे दैनिक स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से भी उपयोगी माना जाता है।
6. नेत्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी
आयुर्वेदिक ग्रन्थों में त्रिफला को नेत्रों के लिए हितकारी औषधि माना गया है। परम्परागत रूप से इसका उपयोग दृष्टि की रक्षा, नेत्रों की सामान्य कार्यक्षमता बनाए रखने तथा नेत्र स्वास्थ्य के संवर्धन के लिए किया जाता रहा है।
यद्यपि आधुनिक विज्ञान इस क्षेत्र में अभी और विस्तृत अध्ययन कर रहा है, फिर भी इसकी पारम्परिक प्रतिष्ठा अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक है।
7. चयापचय (Metabolic Health) में सहायक
कुछ आधुनिक अध्ययनों से संकेत प्राप्त हुए हैं कि संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली के साथ त्रिफला का सेवन रक्त शर्करा (Blood Sugar) तथा रक्त में वसा (Lipid Profile) के स्वस्थ स्तर बनाए रखने में सहायक हो सकता है।
हालाँकि इन संभावित लाभों की पुष्टि के लिए अभी और व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान अपेक्षित हैं, फिर भी प्रारम्भिक परिणाम उत्साहवर्धक माने जा रहे हैं।
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Insights)
यद्यपि त्रिफला का उपयोग आयुर्वेद में सहस्राब्दियों से होता आ रहा है, आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी इसके औषधीय गुणों का निरंतर अध्ययन कर रहे हैं। विभिन्न प्रयोगशाला (In vitro), पशु-अध्ययन (In vivo) तथा सीमित नैदानिक (Clinical) अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि त्रिफला में अनेक जैव सक्रिय (Bioactive) रासायनिक यौगिक पाए जाते हैं, जो इसके औषधीय प्रभावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
त्रिफला में प्रमुख रूप से निम्न जैव सक्रिय घटक पाए जाते हैं—
- गैलिक अम्ल (Gallic Acid)
- एलैजिक अम्ल (Ellagic Acid)
- चेबुलिनिक अम्ल (Chebulinic Acid)
- चेबुलैजिक अम्ल (Chebulagic Acid)
इनके अतिरिक्त इसमें विभिन्न प्रकार के पॉलीफेनॉल, फ्लेवोनॉयड्स, टैनिन्स तथा अन्य प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारक यौगिक भी उपस्थित रहते हैं। ये सभी यौगिक मिलकर शरीर में अनेक लाभकारी जैविक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
अनुसंधानों से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष
वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि त्रिफला में निम्नलिखित गुण हो सकते हैं—
1. प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidant) प्रभाव
त्रिफला में उपस्थित प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारक मुक्त मूलकों (Free Radicals) को निष्क्रिय करने तथा ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इससे कोशिकाओं को होने वाली क्षति कम होती है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
2. प्रदाहरोधी (Anti-inflammatory) गुण
कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि त्रिफला शरीर में सूजन (Inflammation) उत्पन्न करने वाले कुछ जैविक कारकों की सक्रियता को कम करने में सहायक हो सकती है। यह गुण अनेक दीर्घकालिक रोगों की रोकथाम एवं प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
3. रोगाणुरोधी (Antimicrobial) प्रभाव
प्रयोगशाला अध्ययनों से संकेत प्राप्त हुए हैं कि त्रिफला कुछ जीवाणुओं (Bacteria), कवकों (Fungi) तथा अन्य सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को नियंत्रित करने की क्षमता रख सकती है। हालांकि मानवों में इसके प्रभावों की पुष्टि हेतु अभी और व्यापक अनुसंधान आवश्यक हैं।
4. जठरांत्र सुरक्षा (Gastroprotective Effect)
कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में त्रिफला ने पाचन तंत्र एवं जठरांत्र मार्ग (Gastrointestinal Tract) की सुरक्षा में संभावित लाभकारी प्रभाव प्रदर्शित किए हैं। इससे पाचन तंत्र की सामान्य कार्यक्षमता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
5. चयापचय संतुलन (Metabolic Health)
प्रारम्भिक शोध यह संकेत देते हैं कि उचित आहार एवं नियमित जीवनशैली के साथ त्रिफला रक्त शर्करा तथा रक्त में वसा (लिपिड प्रोफ़ाइल) के स्वस्थ स्तर बनाए रखने में सहायक हो सकती है। फिर भी इन संभावित लाभों की पुष्टि के लिए बड़े एवं सुव्यवस्थित नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता है।
सुरक्षा एवं आवश्यक सावधानियाँ (Safety and Precautions)
अनुशंसित मात्रा में सेवन किए जाने पर त्रिफला सामान्यतः सुरक्षित मानी जाती है। फिर भी कुछ सावधानियों का पालन आवश्यक है।
1. अत्यधिक सेवन से बचें
अधिक मात्रा में त्रिफला लेने से कुछ व्यक्तियों में—
- पेट में ऐंठन,
- उदर असुविधा,
- अथवा अतिसार (दस्त)
जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
2. गर्भावस्था एवं स्तनपान
गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को त्रिफला का सेवन केवल चिकित्सकीय परामर्श के पश्चात ही करना चाहिए।
3. अन्य औषधियों के साथ सावधानी
जो व्यक्ति मधुमेह, उच्च रक्तचाप अथवा अन्य दीर्घकालिक रोगों के लिए नियमित औषधियाँ ले रहे हों, उन्हें त्रिफला का सेवन प्रारम्भ करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कुछ परिस्थितियों में औषधीय अंतःक्रियाएँ (Drug Interactions) संभव हो सकती हैं।
त्रिफला के प्रमुख घटकों का विस्तृत परिचय
त्रिफला की प्रभावशीलता इसके तीन प्रमुख घटकों—हरितकी, विभीतकी एवं आमलकी—के संतुलित एवं समन्वित गुणों पर आधारित है। आयुर्वेद में इन तीनों फलों को विशिष्ट औषधीय महत्व प्राप्त है। प्रत्येक फल अपने आप में अनेक गुणों से युक्त है तथा संयुक्त रूप से ये शरीर के विभिन्न अंगों एवं प्रणालियों पर व्यापक एवं संतुलित प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
1. हरितकी (Haritaki / हरड़)
वैज्ञानिक नाम: Terminalia chebula
हरितकी आयुर्वेद की सर्वाधिक प्रतिष्ठित औषधियों में से एक है। इसे संस्कृत में "प्राणदा" अर्थात् प्राण प्रदान करने वाली तथा "अभया" अर्थात् रोगों के भय को दूर करने वाली जैसे नामों से भी संबोधित किया गया है। आयुर्वेद में इसे अनेक स्थानों पर "औषधियों का राजा" (King of Medicines) कहा गया है।
हरितकी का उल्लेख केवल आयुर्वेद में ही नहीं, बल्कि सिद्ध, यूनानी तथा सोवा-रिग्पा (तिब्बती चिकित्सा प्रणाली) में भी प्रमुख औषधि के रूप में मिलता है।
वनस्पतिक परिचय
हरितकी एक विशाल पर्णपाती (Deciduous) वृक्ष है, जो मुख्यतः भारत सहित दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों में पाया जाता है। इसके परिपक्व फलों को सुखाकर औषधीय प्रयोजनों में उपयोग किया जाता है।
इसके फलों में प्रचुर मात्रा में—
- टैनिन्स (Tannins)
- फिनोलिक यौगिक (Phenolic Compounds)
- गैलिक अम्ल
- चेबुलैजिक अम्ल
- चेबुलिनिक अम्ल
जैसे जैव सक्रिय रासायनिक घटक पाए जाते हैं।
औषधीय गुण
आयुर्वेद के अनुसार हरितकी—
- पाचन शक्ति को सुदृढ़ करती है।
- मलोत्सर्जन को नियमित बनाए रखने में सहायक होती है।
- त्रिदोषों, विशेषकर वात दोष, को संतुलित करने में सहायक मानी जाती है।
- शरीर के प्राकृतिक शोधन को प्रोत्साहित करती है।
- भूख एवं अग्नि को सुधारने में सहायक होती है।
आधुनिक अनुसंधान यह भी संकेत देते हैं कि हरितकी में प्रतिऑक्सीकारक, रोगाणुरोधी तथा प्रदाहरोधी गुण विद्यमान हो सकते हैं। कुछ अध्ययनों में इसके यकृत (Liver), हृदय, मस्तिष्क एवं वृक्क (Kidneys) के स्वास्थ्य पर संभावित लाभकारी प्रभावों का भी उल्लेख किया गया है।
2. विभीतकी (Bibhitaki / बहेड़ा)
वैज्ञानिक नाम: Terminalia bellirica
'विभीतकी' शब्द का अर्थ है—"जो भय को दूर करे"। आयुर्वेदिक परम्परा में इसे ऐसा फल माना गया है जो रोगों के भय से रक्षा करता है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसका उपयोग प्राचीन काल से औषधीय एवं सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से होता आया है।
वनस्पतिक परिचय
विभीतकी एक बड़ा पर्णपाती वृक्ष है, जो भारत, नेपाल, श्रीलंका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक भागों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। इसके परिपक्व एवं सूखे फलों का उपयोग औषधि निर्माण में किया जाता है।
इसके फलों में मुख्यतः—
- टैनिन्स
- फ्लेवोनॉयड्स
- गैलिक अम्ल
- एलैजिक अम्ल
जैसे जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं।
औषधीय गुण
आयुर्वेद के अनुसार विभीतकी विशेष रूप से—
- शरीर के शोधन (Detoxification) में सहायक है।
- अतिरिक्त कफ एवं श्लेष्मा को कम करने में उपयोगी मानी जाती है।
- श्वसन तंत्र के स्वास्थ्य का समर्थन करती है।
- पाचन क्रिया को संतुलित बनाए रखने में सहायक होती है।
- कब्ज एवं उदर फुलाव जैसी समस्याओं में पारम्परिक रूप से प्रयुक्त होती है।
आधुनिक अध्ययनों में विभीतकी के प्रतिऑक्सीकारक, प्रदाहरोधी एवं जीवाणुरोधी गुणों की भी संभावना व्यक्त की गई है। इसके अतिरिक्त यह त्वचा, केश, यकृत तथा वृक्कों के स्वास्थ्य के लिए भी संभावित रूप से लाभकारी मानी जाती है।
3. आमलकी (Amalaki / आँवला)
आमलकी आयुर्वेद की सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं बहुपयोगी औषधीय वनस्पतियों में से एक है। इसे प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारकों का उत्कृष्ट स्रोत माना जाता है तथा आयुर्वेद में इसे दीर्घायु, बल, ओज एवं रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले प्रमुख रसायन द्रव्यों में स्थान प्राप्त है।
वनस्पतिक परिचय
आँवला मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष है, जो सम्पूर्ण भारत में व्यापक रूप से पाया जाता है। इसके गोल, हल्के हरे अथवा पीताभ फल अत्यधिक पौष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।
इसमें अनेक महत्वपूर्ण जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- एम्ब्लिकैनिन-A (Emblicanin A)
- एम्ब्लिकैनिन-B (Emblicanin B)
- गैलिक अम्ल
- एलैजिक अम्ल
- विभिन्न पॉलीफेनॉल
इन यौगिकों के कारण आँवले में अत्यंत प्रभावशाली एवं अपेक्षाकृत स्थिर प्रतिऑक्सीकारक क्षमता पाई जाती है।
औषधीय गुण
आयुर्वेद के अनुसार आमलकी—
- रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाती है।
- पाचन एवं यकृत के स्वास्थ्य को समर्थन देती है।
- हृदय एवं रक्तवाहिनी तंत्र के सामान्य कार्य में सहायक होती है।
- त्वचा एवं केशों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में उपयोगी मानी जाती है।
- स्वस्थ वृद्धावस्था एवं ऊतकों के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आँवला केवल औषधि के रूप में ही नहीं, बल्कि एक पौष्टिक खाद्य पदार्थ के रूप में भी अत्यंत लोकप्रिय है। इसका उपयोग रस, मुरब्बा, अचार, चूर्ण, कैंडी तथा अनेक आयुर्वेदिक एवं हर्बल उत्पादों में किया जाता है।
त्रिफला में तीनों फलों का समन्वित महत्व
हरितकी, विभीतकी एवं आमलकी तीनों के गुण एक-दूसरे के पूरक हैं। आयुर्वेद के अनुसार—
- हरितकी मुख्यतः वात के संतुलन में सहायक मानी जाती है।
- विभीतकी का प्रभाव मुख्यतः कफ पर माना जाता है।
- आमलकी विशेष रूप से पित्त को संतुलित करने वाली मानी जाती है।
इसी कारण त्रिफला को त्रिदोषहर योग कहा जाता है। इन तीनों फलों का संतुलित संयोजन शरीर में पाचन, पोषण, शोधन, रोग-प्रतिरोधक क्षमता एवं ऊतक-पोषण जैसी अनेक जैविक प्रक्रियाओं को सामंजस्यपूर्ण ढंग से समर्थ बनाता है।
आयुर्वेद में यही समन्वित प्रभाव त्रिफला को एक साधारण औषधीय मिश्रण से ऊपर उठाकर समग्र स्वास्थ्य संरक्षण, पुनर्यौवन (रसायन) तथा दीर्घकालीन आरोग्य का उत्कृष्ट योग बनाता है।
निष्कर्ष
त्रिफला आयुर्वेद की उन विरल औषधीय कल्पनाओं में से एक है, जिसने सहस्राब्दियों से अपनी उपयोगिता एवं प्रासंगिकता बनाए रखी है। हरितकी, विभीतकी और आमलकी—इन तीन औषधीय फलों का संतुलित एवं वैज्ञानिक दृष्टि से भी रुचिकर संयोजन इसे आयुर्वेद के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रसायन योगों (Rasayana Formulations) में स्थान प्रदान करता है।
आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला का प्रमुख उद्देश्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं, बल्कि शरीर के स्वाभाविक संतुलन को बनाए रखना, पाचन शक्ति को सुदृढ़ करना, त्रिदोषों का सामंजस्य स्थापित करना तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य एवं आरोग्य को प्रोत्साहित करना है। इसके नियमित एवं उचित उपयोग से पाचन, मलोत्सर्जन, शरीर के प्राकृतिक शोधन, रोग-प्रतिरोधक क्षमता, ऊतक-पोषण तथा समग्र जीवनशक्ति को समर्थन मिलने का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलता है।
आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी त्रिफला के औषधीय गुणों को समझने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। अब तक के अध्ययनों से यह संकेत प्राप्त हुए हैं कि इसमें उपस्थित प्राकृतिक जैव-सक्रिय यौगिक—जैसे गैलिक अम्ल, एलैजिक अम्ल, चेबुलिनिक अम्ल, चेबुलैजिक अम्ल, पॉलीफेनॉल तथा फ्लेवोनॉयड्स—प्रतिऑक्सीकारक, प्रदाहरोधी, रोगाणुरोधी तथा पाचन तंत्र के संरक्षण जैसे अनेक संभावित जैविक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। यद्यपि प्रारम्भिक वैज्ञानिक निष्कर्ष उत्साहवर्धक हैं, तथापि इसके अनेक पारम्परिक उपयोगों की पुष्टि के लिए अभी भी व्यापक एवं उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक अध्ययनों की आवश्यकता है।
त्रिफला की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका सौम्य एवं संतुलित प्रभाव है। यह शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को सहयोग प्रदान करते हुए शोधन (Detoxification) और पोषण (Nourishment) दोनों का कार्य करती है। इसी कारण इसे आयुर्वेद में केवल औषधि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण एवं पुनर्यौवन का माध्यम माना गया है।
फिर भी यह स्मरण रखना आवश्यक है कि त्रिफला कोई चमत्कारी उपचार नहीं है और न ही यह संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त निद्रा तथा स्वस्थ जीवनशैली का विकल्प हो सकती है। किसी भी औषधीय द्रव्य की भाँति इसका सेवन भी उचित मात्रा में तथा आवश्यकता होने पर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक अथवा स्वास्थ्य विशेषज्ञ के परामर्श से ही किया जाना चाहिए, विशेषकर गर्भावस्था, स्तनपान अथवा दीर्घकालिक रोगों की स्थिति में।
अंततः, त्रिफला आयुर्वेद की उस समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें रोग होने के बाद उपचार से अधिक महत्व रोग-निवारण, संतुलन, प्रतिरक्षा, पुनर्यौवन और दीर्घकालिक आरोग्य को दिया गया है। यही कारण है कि तीन साधारण प्रतीत होने वाले फलों का यह अद्भुत योग आज भी आयुर्वेदिक चिकित्सा का एक सशक्त स्तंभ बना हुआ है तथा आधुनिक वैज्ञानिक जगत का ध्यान भी निरंतर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।


